Shiv Kavach

🧘 Category: Kavach 📅 22/12/14

  श्री अमोघशिव कवचम्  

 

यह अमोघ शिव कवच परम गोपीनीय, अत्‍यन्‍त आदरणीय, सब पापों को दूर करने वाला, सारे अमहङ्गलों, विध्‍न बाधाओं को हरने वाला, परम पवित्र, जयप्रद और सम्‍पूर्ण विपत्तियों का नाशक माना गया है। यह परम हितकारी है और सब भयों को दूर करता है। इसके प्रभाव से क्षीणायु, मृत्‍यु के समीप पहुँचा हुआ महान् रोगी मनुष्‍य भी शीघ्र निरोगता का प्राप्‍त करता है और उसकी दीर्घायु हो जाती है। अर्थाभाव से पीडि़त मनुष्‍य की सारी दरिद्रता दूर हो जाती है और उसको सुख-वैभव की प्राप्ति होती है। पापी महापातक से छूट जाता है और इसका भक्ति-श्रद्धपूर्वक धारण करने वाला निष्‍काम पुरुष देहान्‍त के बाद दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्‍त होता है।

          महर्षि ऋषभ ने इसका उपदेश करके एक संकट ग्रस्‍त राजा को दुख मुक्‍त किया था। यह कवच श्री स्‍कन्‍द पुराण के ब्रह्मोतर खण्‍ड में है।

          पहले विनियोग छोड़कर ऋष्‍यादिन्‍यास, करन्‍यास और हृदयादि अङ्गन्‍यास करके भगवान् शंकर का ध्‍यान करे। (तदनन्‍तर कवच का पाठ करे।)

अस्‍य श्रीशिवकचस्‍तोत्रमन्‍त्रस्‍य ब्रह्म ऋषि: अनुष्‍टुप, छन्‍द:, श्रीसदाशिरुद्रो देवता, ह्त्रीं शक्ति: वं कीलकम् श्रीं ह्त्रीं क्‍लीं बीजम् सदाशिवप्रीत्‍यर्थे शिवकचस्‍तोत्रजपे विनयोग:।

ऋष्‍यादिन्‍यास:

          ॐ ब्रह्मऋष्‍ये नम: शिरसि। अनुष्‍टुप् छन्‍दसे नम:, मुखे।

          श्रीसदाशिवयुद्रदेवतायै नम:, हृदि। ह्त्रीं शक्‍तये नम:, पदयो:।

          वं कीलकाय नम:, नाभौ। श्रीं ह्त्रीं क्‍लीमिति बीजाय नम:, गुह्ये।

          विनियोगाय नम:, सर्वांगे।

अथ करन्‍यास्

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने ॐ ह्त्रीं रां
          सर्वशक्तिधाम्‍ने ईशानात्‍मने, अंगुष्‍ठाभ्‍यां नम:।

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिन ॐ नं रीं
          नित्‍यंतृप्तिधाम्‍ने। तत्‍तुरुषात्‍मने, तर्जनीभ्‍यां नम:।

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने ॐ मं रूं
          अनादिशक्तिधाम्‍ने अघोरात्‍मने, मध्‍यमाभ्‍यां नम:।

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने, ॐ शिं रैं
          स्‍वतन्‍त्रशक्तिधाम्‍ने वामदेवात्‍मने, अनामिकाभ्‍यां नम:

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने, ॐ वां रौं
          अलुप्‍तशक्तिधाम्‍ने  सद्योजातात्‍मने, कनिष्ठिकाभ्‍यां वौषट्।

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने, ॐ यं र:
          अनादिशक्तिधाम्‍ने, सर्वात्‍मने, करतलकरपृष्‍ठाभ्‍यां नम:।

हृदयाद्यंगन्‍यास:

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने ॐ ह्त्रीं राँ
          सर्वशक्तिधाम्‍ने ईशानात्‍मने हृदयाय नम:।

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने ॐ नं री नित्‍यतृप्तिधाम्‍ने
          तत्‍परुषात्‍मने शिरसे स्‍वाहा।

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने ॐ मं रूं
          अनादिशक्तिधाम्‍ने अघोरात्‍मने शिक्षायै वषठ्।

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने ॐ शिं रैं
          स्‍वतन्‍त्रशक्तिधाम्‍ने वामदेवात्‍मने कवचाय हुम्।

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने ॐ वां रौं
          अलुप्‍तशक्तिधाम्‍ने सद्योजातात्‍मने नेत्रत्रयाय वौषट्।

          ॐ नमो भगवते ज्‍वलज्‍जवालामालिने ॐ यं रं
          अनाशक्तिधाम्‍ने सर्वात्‍म्‍ने अस्‍त्राय फट्।

 

अथ ध्‍यानम्

          वज्रदंष्‍ट्र त्रिनयनं कालकण्‍ठमरिंदमम्।
          सहस्‍त्रकरमप्‍युग्रं वन्‍दे शम्‍भुमुमापतिम्।

ध्‍यानार्थ :- जिनकी दाढ़े बज्र के समान हैं, जो त्रिनेत्रधारी हैं, जिनके कण्‍ठ में हलाहल-पान का नीला चिन्‍ह सुशोभित होता है, जो शत्रुभाव रखनेवालों को दबाने वाले हैं, जिनके सहस्‍त्रों हाथ हैं तथा जो अभक्‍तों के लिए अत्‍यन्‍त उग्र हैं, उन उमापति शम्‍भु (भगवान् शिव जी) को मैं प्रणाम करता हूँ।

 

ऋषभ उवाच

          नमस्‍कृत्‍य महादेवं विश्‍वाव्‍यापिनमीश्‍वरम्।
          वक्ष्‍ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम्।। 1 ।।

          अथापरं सर्वपुराणगुह्यं नि:शेषपापौघहरं पवित्रम्।
          जयप्रदं सर्वविपद्विमोचनं वक्ष्‍यामिश्‍वं कवचं हिताय ते।।

ऋषभ जी कहते हैं – जो सम्‍पूर्ण पुराणों में गोपनीय कहा गया है, समस्‍त पापों को हर लेने वाला है, पवित्र जयदायक तथा सम्‍पूर्ण विपत्तियों से छुटकारा दिलाने वाला है, उस सर्वश्रेष्‍ठ शिव कवच का मैं तुम्‍हारे हित के लिए उपदेश करूंगा। मैं विश्‍वव्‍यापी ईश्‍वर महादेव जी को नमस्‍कार करके मनुष्‍यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाले इस शिवस्‍वरूप कवच का वर्णन करता हूँ। 1 ।

          शुचौ देशे समासीनो यथावत्‍कल्पितासन:।
          जितेन्‍द्रयो जितप्राणश्चिन्‍तयेच्छिवमव्‍यम्।। 2 ।।

पवित्र स्‍थान में तथा योग्‍य आसन बिछाकर बैठे। इन्द्रियों को अपने वश में करके प्राणायाम पूर्वक अविनाशी भगवान् शिव का चिंतन करें। 2 ।

          हृत्‍यपुण्‍डरीकांतरसंनिविष्‍ठं स्‍वतेजसा व्‍याप्‍तनभोऽवकाशम्।
          अ‍तीन्द्रियं सूक्ष्‍मनन्‍तमाद्यं ध्‍यायेत् परानंदमयं महेशम्।। 3 ।।

‘परमानन्‍दमय भगवन् महेश्‍वर हृदय-कमल के भीतर की कर्णिका में विराजमान हैं, उन्‍होंने अपने तेज से आकाश मण्‍डल को व्‍याप्‍त कर रखा है। वे इन्द्रियातीत, सूक्ष्‍म, अनन्‍त एवं सबके आदिकारण हैं।‘ इस तरह उनका चिन्‍तन करें। 3 ।

          ध्‍यानावधूताखिलकर्मबन्‍धश्चिरं चिदानंदनिमग्‍नचेता:।
          षडक्षरन्‍याससमाहितात्‍मा शैवेन कुर्यात् कवचेन रक्षाम्।। 4 ।।

इस प्राकर ध्‍यान के द्वारा समस्‍त कर्म बंधन का नाश करके चिदानन्‍दमय भगवान् सदाशिव में अपने चित्‍त को चिर काल तक लगाये रहे। फिर षडक्षरन्‍यास के द्वारा अपने मन को एकाग्र करके मनुष्‍य निम्‍नांकित शिव कवच के द्वारा अपनी रक्षा करे। 4 ।

श्री शिव कवच प्रारम्‍भ

          मां पातु देवोऽखिलदेवतात्‍मा, संसारकूपे पतितं गभीरे।
          तन्‍नाम दिव्‍यं वरमन्‍त्रमूलं, धुनोतु मे सर्वमद्यं हृदिस्‍थम्।। 5 ।।

सर्वदेवमय महादेव जी गहरे संसार-कूप में गिरे हुए मुझ असहाय की रक्षा करें। उनका दिव्‍य नाम जो उनके श्रेष्‍ठ मंत्र का मूल है। मेरे हृदय स्थित समस्‍त पापों का नाश करें। 5 ।

          सर्वत्र मां रक्षतु विश्‍वमूर्ति-ज्‍योर्तिर्मयानन्‍दघनश्चिदात्‍मा।
          अणोरणीयानुरुशविरेक: स ईश्‍वर: पातु भयांदशेषात्।। 6 ।।

सम्‍पूर्ण विश्‍व जिनकी मूर्ति है, जो ज्‍योतिर्मय आनन्‍दघनस्‍वरूप चिदात्‍मा हैं, वे भगवान् मेरी सर्वत्र रक्षा करें। जो सूक्ष्‍म से भी अत्‍यन्‍त सूक्ष्‍म हैं, महान शक्ति से सम्‍पन्‍न हैं, वे अद्वितीय ‘ईश्‍वर’ महादेव जी सम्‍पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करें। 6 ।

          यो भूस्‍वरूपेण बिभत्रि विश्‍वं, पायात् स भूमेर्गिरिशोऽष्‍टमूर्ति:।
          योऽपां स्‍वरूपेण नृणां करोति, संजीवनं सोऽवतु मां जलेभय:।। 7 ।।

जिन्‍होंने पृथ्‍वी रूप से इस विश्‍व को धारण कर रखा है, वे अष्‍टमूर्ति ‘गिरिश’ पृथ्‍वी से मेरी रक्षा करें। जो जल रूप से जीवों को जीवन दान दे रहे हैं, वे ‘शिव’ जल से मेरी रक्षा करें। 7 ।

          कल्‍पावसाने भुवनानि दग्‍ध्‍वा सर्वाणि यो नृत्‍यति भूरिलील:।
          स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्‍ने-र्वात्‍यादिभीतेरखिलाच्‍च तापात्।। 8 ।।

जो विशद लीला विहारी ‘शिव’ कल्‍प के अन्‍त में समस्‍त भवनों को दग्‍ध करके (आनन्‍द से) नृत्‍य करते हैं, वे ‘कालरुद्र’ भगवन् दावानल से, आंधी-तूफान से भय से और समस्‍त तापों से मेरी रक्षा करें। 8 ।

          प्रदीप्‍तविद्युत्‍कनकावभासो विद्यावराभीतिकुइारपाणि:।
          चतुर्मुखस्‍तपुत्‍रुषस्त्रिनेत्र: प्राच्‍यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम्।। 9 ।।

प्रदीप्‍त विद्युत एवं स्‍वर्ण के सदृश जिनकी कान्ति है, विद्या, वर और अभय (मुद्राएं) तथा कुल्‍हाड़ी जिनके कर-कमलों में सुशोभित है, चतुर्मुख त्रिलोचन है, वे भगवान् ‘तत्‍पुरुष’ पूर्व दिशा में निरन्‍तर मेरी रक्षा करें। 9 ।

          कुठारवेदांकुशपाशशूल-कपालढक्‍काक्षगुणान् दधान:।
          चतुर्मुखो नीलरुचिस्रिनेत्र: पायादघोरो दिशि दक्षिणस्‍याम्।। 10 ।।

जिन्‍होंने अपने हाथों में कुल्‍हाड़ी, वेद, अंकुश, फन्‍दा, त्रिशूल, कपाल, डमरू और रुद्राक्ष की माला को धारण कर रखा है तथा जो चतुर्मुख हैं, वे नीलं कांति त्रिनेत्रधारी भगवान् ‘अघोर’ दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें। 10 ।

          कुन्‍देन्‍दुशंखस्‍फटिकावभासो, वेदाक्षमालावरदायभयांक:।
          त्र्यक्षश्‍चतुर्वक्‍त्र उरुप्रभाव: सद्योऽधिजातोऽवतु मां प्रतीच्‍याम्।। 11 ।।

कुन्‍द, चन्‍द्रमा, शंख और स्‍फटिक के समान जिनकी उज्‍जवल कांति है, वेद रुद्राक्ष माला, वरद और अभय(मुद्राओं) से जो सुशोभित हैं, वे महाप्रभावशाली चतुरानन एवं त्रिलोचन भगवान् ‘सद्योजात’ पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें। 11 ।

          वराक्षमालाभयटङ्क हस्‍त: सरोजकिञ्जल्‍कसमानवर्ण:।
          त्रिलोचनश्‍चात्रचतुर्मुखो मां पायादुदीच्‍यां दिशि वामदेव:।। 12 ।।

जिनके हाथों में वर एवं अभय (मुद्राएं), रुद्राक्षमाला और टाकी विराजमान हैं तथा कमल-किञ्जल्‍क के सदृश जिनका गौर वर्ण है, वे सुन्‍दर चार मुख वाले त्रिनेत्रधारी भगवान् ‘वामदेव’ उत्‍तर दिशा में मेरी रक्षा करें। 12 ।

          वेदाभयेष्‍टांकुशपाशटङ्क – कपालढक्‍काक्षकशूलपाणि:।
          सितद्युति: पञ्चमुखोऽवतान्‍मा, मीशान उर्ध्‍व परमप्रकाश:।। 13 ।।

जिनके कर-कमलों में वेद, अभय और वर (मुद्राएं), अंकुश, टांकी, फन्‍दा, कपाल, डमरू, रूद्राक्षमाला और त्रिशूल सुशोभित हैं, जो श्‍वेत आभा से युक्त हैं, वे परम प्रकाश रूप पञ्चमुख भगवान् ‘ईशान’ मेरी ऊपर से रक्षा करें। 13 ।

          मूर्द्धानमव्‍यान्‍मम चन्‍द्रमौलिर्भालं ममाव्‍यादथ भालनेत्र:।
          नेत्रे ममाव्‍याद् भगनेत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्‍वनाथ:।। 14 ।।

भगवान ‘चन्‍द्रमौलि’ मेरे सिर की, ‘भालनेत्र’ मेरे ललाट की, ‘भगनेत्रहरी’ मेरे नेत्रों की और ‘विश्‍वनाथ’ मेरी नासिका की सदा रक्षा करें। 14 ।

          पायाच्‍छुती में श्रुतिगीतकीर्ति:, कपोलमव्‍यात् सततं कपाली।
          वक्‍त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्‍त्रो, जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्व:।। 15 ।।

‘श्रुतिगीतकीर्ति’ मेरे कानों की, ‘कपाली’ निरन्तर मेरे कपोलों की, ‘पञ्चमुख’ मुख की तथा ‘वेदजिह्व’ जीभ की रक्षा करें। 15 ।

          कण्‍ठं गिरिशोऽवतु नीलकण्‍ठ:, पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणि:।
          दोर्मूलमव्‍यान्‍मम धर्मबाहु-र्वक्ष: स्‍थलं दक्षमखान्‍तकोऽवात्।। 16 ।।

‘नीलकण्‍ठ’ महादेव मेरे गले की, ‘पिनाकपाणि’ मेरे दोनों हाथों की, ‘धर्मबाहु’ दोनों कन्‍धों की तथा ‘दक्षयज्ञविध्‍वंसी’ मेरे वक्ष: स्‍थल की रक्षा करें। 16 ।

          ममोदरं पातु रिरिन्‍द्रधन्‍वा, मध्‍यं ममाव्‍यान्‍मदनान्‍तकारी।
          हेरम्‍बतातो मम पातु नाभिं, पायात् कटी धूर्जटिरीश्‍वरो।। 17 ।।

‘गिरिन्‍द्रधन्‍वा' मेरे पेट की, ‘कामदेव के नाशकद्व मध्‍यदेश की, ‘गणेश जी के पिता’ मेरी नाभि की तथा ‘धूर्जटि’ मेरी कटि की रक्षा करें। 17 ।

          उरूद्वयं पातु कुबेरमित्रो, जानुद्वयं मे जगदीश्‍वरोऽव्‍यात्।
          जङ्घायुगं पुङ्गवकेतुरव्‍यात्, पादौ ममाव्‍यात् सुरवन्‍द्यपाद:।। 18 ।।

‘कुबेरमित्र’ मेरी दोनों जांघों की, ‘जगदीश्‍वर’ दोनों घुटनों की, ‘पुंगवकेतु’ दोनों पिंडलियों की और ‘सुरवंद्यचरण’ मेरे पैरों की सदैव रक्षा करें। 18 ।।

          महेश्‍वर: पातु दिनादियामे, मां मध्‍यमामेऽवतु वामदेव:।
          त्रियम्‍बक: पातु तृतीययामे, वृषभध्‍वज: पातु दिनान्‍त्‍ययामे।। 19 ।।

‘महेश्‍वर’ दिन के पहले पहर में मेरी रक्षा करें। ‘वामदेव’ मध्‍य पहर में मेरी रक्षा करें। ‘त्र्यम्‍बक’ तीसरे पहर में और ‘वृषभध्‍वज’ दिन के अंत वाले पहर में मेरी रक्षा करें। 19 ।

          पायान्निशादौ शशिशेखरो मां गङ्गाधरो रक्षतु मां निशीथे।
          गौरांपति: पातु निशावसाने मृत्‍युञ्जयो रक्षतु सर्वकालम् ।। 20 ।।

‘शशिशेखर’ रात्रि के आरम्‍भ में, ‘गंङ्गाधर’ अर्धरात्रि में, ‘गौरीपति’ रात्रि के अन्‍त में और ‘मृत्‍युञ्जय’ सर्वकाल में मेरी रक्षा करें। 20 ।

          अन्‍त: स्थितं रक्षतु शङ्करो मां, स्‍थाणु: सदा पातु बहि: स्थितं माम्।
          तदन्‍तरे पातु पति: पशूनां, सदाशिवो रक्षतु मां समन्‍तात् ।। 21 ।।

‘शङ्कर’ घर के भीतर रहने पर मेरी रक्षा करें। ‘स्‍थाणु’ बाहर रहने पर मेरी रक्षा करें, ‘पशुपति’ बीच में मेरी रक्षा करें तथा ‘सदाशिव’ सब ओर मेरी रक्षा करें। 21 ।

          तिष्‍ठन्‍तमव्‍याद्भुवनैकनाथ: पायाद् व्रजन्‍तं प्रमथाधिनाथ:।
          वेदांतवेद्योऽवतु मां निषण्‍णं मामव्‍यय: पातु शिव: शयनाम् ।। 22 ।।

‘भुवनैकनाथ’ खड़े होने के समय, ‘प्रमथनाथ’ चलते समय, ‘वेदान्‍तवैद्य’ बैठे रहने के समय और ‘अविनाशी शिव’ सोते समय मेरी रक्षा करें।। 22 ।।

          मार्गेषु मां रक्षतु नीलकण्‍ठ: शैलादिदुर्गेषु पुरत्रयारि:।
          अरण्‍यवासादिमहाप्रवासे पायान्‍मृगव्‍याध उदारशक्ति:।।

‘लीनकण्‍ठ’ रास्‍ते में मेरी रक्षा करें। ‘त्रिपुरारि’ शैलादि दुर्गो में और उदारशक्ति ‘मगव्‍याध’ वनवासादि महान प्रवासों में मेरी रक्षा करें । 23।

          कल्‍पान्‍तकाटोपपटुप्रकोप: स्‍फुटाट्टहासोच्‍चलिताण्‍डकोश:।
          घोरारिसेनार्णवदुर्निवार-महाभयाद् रक्षतु वीरभद्र:।। 24 ।।

जिनका प्रबल क्रोध कल्‍पों का अन्‍त करने में अत्‍यन्‍त पट है, जिन के प्रचझउ अट्टहास से ब्रह्माण्‍ड कांप उठता है, वे ‘वीरभद्रजी’ समुद्र के सदृश भयानक शत्रु सेना के दुर्निवार महान भय से मेरी रक्षा करें। 24 ।

          पत्‍त्‍यश्र्वमातंगघटावरूथ्‍- सहस्रलक्षायुतकोटिभीषणम्।
          अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां क्षिन्‍द्यन्‍मृडो घोरकुठारधारया।। 25 ।।

भगवान ‘मड’ मुझ पर आततायी रूप से आक्रमण करने वालों की हजारों, दस हजारों, लाखों और करोड़ों पैदलों, घोड़ों और हाथियों से युक्‍त अति भीषण सैकड़ों अक्षौहिणी सेनाओं का अपनी घोर कुठार धार से भेदन करें। 25 ।

          निहन्‍तु दस्‍यून् प्रलयानलार्चि-र्ज्‍वलत् त्रिशूलं त्रिपुरान्‍तकस्‍य।
          शा र्दूसिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान् संत्रासयत्‍वीशधनु: पिनाकम्।। 26 ।।

भगवान ‘ त्रिपुरान्‍तक’ का प्रलयाग्नि के समान ज्‍वालाओं से युक्‍त जलता हुआ त्रिशूल मेरे दस्‍यु दल का विनाश कर दे और उनका पिनाक धनुष, चीता, सिंह, रीछ, भेडि़या आदि हिंस्र जन्‍तुओं को संत्रस्‍त करें। 26 ।

          दु:खस्‍वप्‍नदुश्‍शकुनदुर्गतिदौर्मनस्‍य-दुर्भिक्षदुर्व्‍यसनदुस्‍सहदुर्यंशांसि।
          उत्‍पाततापविषभीतिमसद्रग्रहार्तिव्‍याधींश्‍च नाशयतु मे जगतामधीश:।। 27 ।।

वे जगदीश्‍वर मेरे बुरे स्‍वप्‍न, बुरे शकुन, बुरी गति, मन की दुष्‍ट भावना, दुर्भिक्ष, दुर्व्‍यसन, दुस्‍सह, अपयश, उत्‍पाद, सन्‍ताप, विषभय, दुष्‍ट ग्रहों की पीड़ा तथा समस्‍त रोगों का नाश करें। 27 ।

ॐनमो भगवते सदाशिवाय सकलतत्‍त्‍वात्‍मकाय राकलतत्‍त्‍वविहाराय सकललौकेककत्रे सकललो क कै क भर्त्रे सकललोकैकहर्त्रे सकललोकैकगुरवे सकललोकराक्षिणे सकलनिगमगुह्याय सकलवरप्रदाय सकलदुरितार्तिभञ्जनाय सकलजगदभयंकराय सकललोकैकशंकराय शशांकशेखराय शाश्‍वतनिजाभासाय निर्गुणाय निरूपमाय नीरूपाय निराभासाय निरामयाय निष्‍प्रपंचाय निष्‍कलंकाय निर्द्वन्‍न्‍द्वाय निस्‍संगाय निर्मलाय निर्गमाय नित्‍यरूपविभवाय निरूपमविभवाय निराधाराय नित्‍यशुद्धबुद्धपरिपूर्णसच्चिदानन्‍दाद्वयाय परमशान्‍तंप्रकाशतेजोरूपाय जय जय महारूद्र महारौद्र भद्रावतार दु:खदावदारण महाभैरव कालभैरव कल्‍पान्‍तभैरव कलपान्‍तभैरव कपालमालाधर खट्वांगखंगचर्मपाशांकुशडमरू शूलचापबाणगदाशक्तिभिन्दिपालतोमरमूसलमुगद्रपट्टिशपरशुपरिघभ्‍ज्ञुशुण्‍डीशताध्‍नीचक्राद्या युधभीषणकर सहस्रमुख दंष्‍ट्राकराल विकटाट्टहासविसफारितब्रह्माण्‍डमण्‍डललनागेन्‍द्रगुण्‍डल नागेन्‍द्रहार नाग्रन्‍द्रवलय नाग्रन्‍द्रचर्मधर मृत्‍युञ्जय त्र्यम्‍बक त्रिपुरान्‍तक विरूपाक्ष विश्‍वेश्‍वर वृषभवाहन विषभूषण विश्‍वतोमुख सर्वतो रक्ष रक्ष मां ज्‍वल ज्‍वल महामृत्‍युभयमुत्‍सादयोत्‍सादयं नाशय नाशय रोगभयमुत्‍सादयोत्‍सादय विषसर्पभयं शमय शमय चोभयं मारय मारय मम शत्रुनुच्‍चाटयोच्‍चाट य शूलेन विदारय विदारय कुठारेण भिन्धि भिन्धि खंगेन छिन्धि छिन्धि खट्वांगेन विपोथय विपोथय मुसलेन निष्‍पेषय निष्‍पेषय बाणै: संताडय संताडय रक्षांसि भीषय भीषय भूतानि विद्रावय विद्रावय कूष्‍मांडवेतालमारीगणब्रह्म-राक्षसान् संत्रासय संत्रासय ममाभयं कुरु कुरु वित्रस्‍तं मामाश्‍वासयाश्‍वासय नरकभयान्‍मामुद्धारयोद्धारय संजीवय संजीवय क्षुत्‍तृड्भ्‍यां मामाप्‍याययाप्‍यायय दु:खतुरं मामानन्‍दयानन्‍दय शिवकवचेन मामाच्‍छादयाच्‍छादय त्र्यम्‍बक सदाशिव नमस्‍ते नमस्‍ते नमस्‍ते।

ॐ जिनका वाचक है, सम्‍पूर्ण तत्‍त्‍व जिनके स्‍वरूप है, जो सम्‍पूर्ण तत्‍त्‍वों में विचरण करने वाले, समस्‍त लोगों के एकमात्र कर्ता और सम्‍पूर्ण विश्‍व के एकमात्र भरण-पोषण करने वाले हैं, जो अखिल विश्‍व के एक ही संहारकारी, सब लोगों के एकमात्र गुरु, समस्‍त संसार के एक ही साक्षी, सम्‍पूर्ण वेदों के गूढ़ तत्‍त्‍व, सबको वर देने वाले, समस्‍त पापों और पीड़ाओं का नाश करने वाले, सारे संसार को अभय देने वाले, सब लोगों को एकमात्र कल्‍याणकारी, चन्‍द्रमा का मुकुट धारण करने वाले, अपने सनातन-प्रकाश से प्रकाशित होने वाले, निर्गुण, उपमारहित, निराकार, निराभास, निरामय, निष्‍प्रपञ्च, निष्‍कलंक, निर्द्वन्‍द, निस्‍संग, निर्मल, गति-शून्‍य, नित्‍यरूप, नित्‍य वैभव से सम्‍पन्‍न, अनुपम ऐश्‍वर्य से सुशोभित, आधार शून्‍य, नित्‍य-शुद्ध-बुद्ध, परिपूर्ण, सच्चिदानन्‍दघन, अद्वितीय तथा परम शांत, प्रकाशमय, तेज:स्‍वरूप हैं, उन भगवान सदाशिव को नमस्‍कार है। हे महारुद्र, महादौद्र, भद्रावतार, दु:ख-दावाग्नि-विदारण, महाभैरव, कालभैरव, कलपान्‍त भैरव, कपालमालाधारी! हे खटवांग, खंग, ढाल, फन्‍दा अंकुश, डमरू, त्रिशूल, धनुष, बाण, गदा, शक्ति, भिन्दिपाल, तोमर, मूसल, मुग्‍दर, पट्टिश, परशु, परिघ, भ्‍ज्ञुशुण्‍डी, शतघ्‍नी और चक्र आदि आयुधों के द्वारा भयंकर हाथों वाले! हजार मुख और दष्‍ट्रा से कराल, विकट अट्हास से विशाल ब्रह्माण्‍ड-मण्‍डल का विस्‍तार करने वाले, नागेन्‍द्र वासुकि को कुण्‍डल, हार, कंकण तथा ढाल के रूप में धारण करने वाले, मृत्‍युञ्जय, त्रिनेत्र, त्रिपुरनाशक, भयंकर नेत्रों वाले, विश्‍वेश्‍वर, विश्‍वरूप में प्रकट, बैल पर सवारी करने वाले, विष को गले में भूषण रूप में धारण करने वाले तथा सब ओर मुख वाले शंकर! आपकी जय हो, जय हो! आप मेरी सब ओर से रक्षा कीजिए। प्रज्‍वलित होइये, प्रज्‍वलित होइये।

मेरे महामृत्‍यु-भय का तथा अपमृत्‍यु के भय का नाश कीजिए, नाश कीजिए। (बाहर और भीतरी) रोग-भय को जड़ से मिटा दीजिए जड़ से मिटा दीजिए। विष और सर्प के भय को शान्‍त कीजिए, शान्‍त कीजिए। चोर भय को मार डालिये, मार डालिये। मेरे (काम-क्रोध-लोभादि भीतरी तथा इन्द्रियों के और शरी के द्वारा होने वाले पाप कर्मरूपी बाहरी)शत्रुओं का उच्‍चाटन कीजिए, उच्‍चाटन कीजिए; त्रिशूल के द्वारा विदारण कीजिए विदारण कीजिऐ; कुठार के द्वक्षरा काट डालिये, काट डालिये; खंग के द्वारा छेद डालिये, छेद डालिये, खटवांग के द्वारा नाश कीजिये; मूसल के द्वारा पीस डालिये, पीस डालिये और बाणों के द्वारा बींध डालिये। (आप मेरी हिंसा करने वाले) राक्षसों को भय दिखाइये, भय दिखाइये। भूतों को भगा दीजिए, भगा दीजिए।

कूष्‍माण्‍ड, वेताल, मारियों और ब्रह्मा-राक्षसों को संत्रस्‍त कीजिए संत्रस्‍त कीजिए। मुझको अभय दीजिए, अभय दीजिए। मुझ अत्‍यन्‍त डरे हुए को आश्‍वासन दीजिए, आश्‍वासन दीजिए। नरक-भय से मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिए। मुझे जीवन-दान दीजिए, जीवन दान दीजिए, क्षुधा तृष्‍णा का निवारण करके मुझको आप्‍यायित कीजिए, आप्‍यायित कीजिए। आपकी जय हो, जय हो। मुझ दु:खातुर को आनन्दित कीजिए, आनन्दित कीजिए। शिव कवच से मुझे आच्‍छादित कीजिए, आच्‍छादित कीजिए। त्र्यम्‍बक सदाशिव् आपको नमस्‍कार है, नमस्‍कार है, नमस्‍कार है।

 

ऋषभ उवाच

 

          इत्‍येतत्‍कवचं शैवं वरदं व्‍याहृतं मया।
          सर्वबाधाप्रशमनं रहस्‍यं सर्वदेहिनाम् ।। 28 ।।

ऋषभ जी कहते हैं- इस प्रकार यह वरदायक शिव कवच मैंने कहा है। यह सम्‍पूर्ण बाधाओं को शानत करने वाला तथा समस्‍त देहधारियों के लिए गोपनीय रहस्‍य है। 28 ।

          य: सदा धारयेन्‍मर्त्‍य: शैव: कवचमुत्‍तमम्।
          न तस्‍य जायते क्‍वापि भयं शंभोरनुग्रहात् ।। 29 ।।

जो मनुष्‍य इस उत्‍तम कवच को सदा धारण करता है, उसे भगवान शिव के अनुग्रह से कभी और कहीं भी भय नहीं होता । 29 ।

          क्षीणार्युमृत्‍युमापत्रौ महारोगहतोऽपि वा।
          सद्य: सुखमवाप्‍नोति दीर्घमायुश्‍च विन्‍दति ।। 30 ।।

जिसके आयु क्षीण हो चली है, जो मरणासन्‍न हो गया है अथवा जिसे महान रोगों ने मृतक सा कर दिया है वह भी इस कवच के प्रभाव से तत्‍काल सुखी हो जाता है और दीर्घायु प्रापत कर लेता है। 30 ।

          सर्वदारिद्रयशमनं सौमङ्गल्‍यविवर्धनम्।
          यो धत्‍ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्‍यते ।। 31 ।।

शिव कवच समस्‍त दरिद्रता का शमन करने वाला और सौमंगल्‍य को बढ़ाने वाला है, जो इसे धारण करता है, वह देवताओं से भी पूजित होता है। 31 ।

          महापातकसंघातैर्मुच्‍युते चोपपातकै:।
          देहान्‍ते शिवमाप्‍नोति शिववर्मानुभावत: ।। 32 ।।

इस शिव कवच के प्रभाव से मनुष्‍य महापातकों के समूहों और उपपातकों से भी छुटकारा पा जाता है तथा शरीर का अन्‍त होने पर शिव को पा लेता है। 32 ।

          त्‍वमपि श्रद्धया वत्‍स शैवं कवचमुत्‍तमम्।
          धारयस्‍व मया दत्‍तं सद्य: श्रेयो ह्यवात्‍स्‍यसि ।। 33 ।।

वत्‍स! तुम भी मेरे दिये हुए इस उत्‍तम शिव कवच को श्रद्धापूर्वक धारण करो, इससे तुम शीघ्र और निश्‍चय ही कल्‍याण के भागी होआोगे। 33 ।

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