Saraswati Kavach

🧘 Category: Kavach 📅 22/12/14

  सर्वकामदम् श्री सरस्‍वती कवचम्  

 

गुरु उवाच

          श्रृणु शिष्‍य! प्रवक्ष्‍यामि कवचं सर्वकामदम्,
          धृत्‍वा तु सततं सर्वैं: प्रपाठ्यो!sयं स्‍तव: शुभ:।। 1 ।।

वृहस्‍पति जी बोले – शिष्‍य! सुनो! सम्‍पूर्ण कार्य पूरा करने वाले कवच को कहता हूँ। इस शुभ कवच को धारण करके सभी को पाठ करना चाहिए।

विनियोग मन्‍त्र:

अस्‍य श्री सरस्‍वती स्‍तोत्र कवचस्‍य प्रजापति ऋषि: अनुष्‍टुप् छन्‍द: शारदा देवता, सर्वतत्‍व परिज्ञाने सर्वार्थ साधनेषु च कवितासु च सर्वासु विनियोग: प्रकीर्तित: इति पठित्‍वा विनियोगं कुर्यात्।

।।कवच प्रारम्‍भ।।

          श्रीं हृीं सरस्‍वत्‍ये स्‍वाहा शिरो मे पातु सवर्त:,
           श्रीं वाग्‍देवतायै स्‍वाहा भालं मे सर्वदावतु।। 1 ।।

ॐ श्रीं ह्त्रीं सरस्‍वती के लिए स्‍वाहा, मेरे शिर की चारों ओर से रक्षा करें। ॐ श्री वाणी देवी के लिए स्‍वाहा मेरे ललाट की हमेशा रक्षा करें।

          सरस्‍वत्‍यै स्‍वाहेति श्रोत्रेपातु निरन्‍तरम्,
           हृीं श्रीं भगवत्‍यै सरस्‍वत्‍यैस्‍वाहा नेत्रयुग्‍मंसदावतु।। 2 ।।

ॐ सरस्‍वती के लिए स्‍वाहा कान में निरन्‍तर रक्षा करें। ॐ ह्त्रीं श्रीं भगवती सरस्‍वती के लिए स्‍वाहा दोनों नेत्रों की रक्षा सदा करें।

          ऐं ह्त्रीं वाग्‍वादिन्‍यै स्‍वाहा नासाँ मे सर्वदावतु,
           ह्त्रीं विद्याऽधिष्‍ठातृ दैव्‍यै स्‍वाहा चोष्‍ठं सदावतु ।। 3 ।।

ॐ ऐं ह्त्रीं वाग्‍वादिनी के लिए स्‍वाहा मेरे नाक को हमेशा रक्षा करें। ॐ ह्त्रीं विधा अधिष्‍ठात्री देवी के लिए स्‍वाहा है वह मेरे ओष्‍ठों की रक्षा करें।

          ॐ श्रीं हृीं ब्राह्मयै स्‍वाहेति दन्‍तपंक्ति सदावतु,
          ॐ ऐं इत्‍येकाक्षरी मन्‍त्रो मम कण्‍ठं सदाऽवतु।। 4 ।।

ॐ श्रीं ह्त्रीं ब्राह्मी के लिए स्‍वाहा वे मेरी दाँत की पंक्ति में सदा रक्षा करें।  ॐ ऐं ऐसा एकाअक्षर का मन्‍त्र मेरे कण्‍ठ की हमेशा रक्षा करें।

          ॐ श्रीं हृीं पातु मे ग्रीवां स्‍कन्‍धौ मे श्री: सदावतु,
          ॐ हृीं विद्याऽधिष्‍ठात्री दैव्‍यै स्‍वाहा वक्ष: सदावतु।। 5 ।।

ॐ श्रीं ह्त्रीं मेरे गले की रक्षा करें मेरे दोनों स्‍कन्‍धों की रक्षा करें। ॐ ह्त्रीं विद्या की अधिष्‍ठात्री के लिए स्‍वाहा, वे मेरे वक्षस्‍थल की रक्षा हमेशा करें।

          ॐ हृीं विद्याऽधिस्‍वरूपायै स्‍वाहा मे पातु नाभिकाम्,
          ॐ हृीं क्‍लीं वाण्‍यै स्‍वाहेति मम हस्‍तौ सदावतु।। 6 ।।

ॐ ह्त्रीं विद्या अधिस्‍वरूपा के लिए स्‍वाहा वे मेरी नाभि की रक्षा करें। ॐ क्‍लीं वाणी के लिए स्‍वाहा वे मेरे दोनों हाथों की रक्षा सदा करें।

          ॐ सर्ववर्णात्मिकार्य स्‍वाहा पादयुग्‍मं सदावतु,
          ॐ वागधिष्‍ठात देव्‍यै स्‍वाहा सर्व सदावतु।। 7 ।।

ॐ सभी वर्णात्मिका स्‍वरूपिणी देवी के लिए स्‍वाहा दोनों चरणों की सदा रक्षा करें। ॐ वाणी की अधिष्‍ठात्री देवी के लिए स्‍वाहा सदा चारों ओर से रक्षा करें।

          ॐ सर्व कण्‍ठवासिन्‍यै स्‍वाहा प्राच्‍यां सदावतु,
          ॐ सर्व जिह्वाग्रवासिन्‍यै स्‍वाहाऽग्नि दिशा रक्षतु।। 8 ।।

ॐ सभी के कण्‍ठ में वास करने वाली के लिए स्‍वाहा पूर्व दिशा की रक्षा करें। ॐ सभी के जिह्वा के आगे रहने वाली के लिए स्‍वाहा आग्‍नेय दिशा की रक्षा करें।

          ॐ ऐं हृीं श्रीं क्‍लीं सरस्‍वत्‍यै बुध जनन्‍यै स्‍वाहा,
          ॐ सततं मन्‍त्र राजोय दक्षिणे मां सदावतु।। 9 ।।

ॐ ऐं ह्त्रीं श्रीं क्‍लीं सरस्‍वती बुध जननी के लिए स्‍वाहा। ॐ निरन्‍तर यह मन्‍त्रों का राजा मेरे दक्षिण की ओर रक्षा करें।

          ॐ ऐं हृीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्‍त्रो नैऋत्‍ये सर्वदाऽवतु,
          ॐ ऐं हृीं श्रीं जिह्वाग्रवासिन्‍यै स्‍वाहा प्रातीच्‍यां मां सर्वदावतु।। 10 ।।

ॐ ऐं ह्त्रीं श्रीं तीन अक्षर का मंत्र नैर्ऋत्‍य में सदा रक्षा करें। ॐ ऐं ह्त्रीं जिह्वा के आगे बैठने वाली के लिए स्‍वाहा, वे पश्चिम में सदा रक्षा करें।

          ॐ सर्वाम्बिकायै स्‍वाहा वायव्‍ये मां सदाऽवतु,
          ॐ ऐं हृीं क्‍लीं गद्यपद्यवासिन्‍यैस्‍वाहा मामुत्‍तरेसदावतु।। 11 ।।

ॐ सबकी अम्बिका के लिए स्‍वाहा मेरे वायव्‍य में सदा रक्षा करें। ॐ ऐं ह्त्रीं क्‍लीं गद्य पद्य में निवास करने वाली के लिए स्‍वाहा मुझको उत्‍तर की ओर से सदा रक्षा करें।

          ॐ ऐं सर्वशास्‍त्रवादिन्‍य स्‍वाहैशान्‍यै सदावतु,
          ॐ हृीं सर्व पूजितायै स्‍वाहा चोर्ध्‍व सदावतु।। 12 ।।

ॐ ऐं सम्‍पूर्ण शास्‍त्र बोलने वाली के लिए स्‍वाहा ईशान की तरफ हमेशा रक्षा करें। ॐ ह्त्रीं सभा के द्वारा पूजिता के लिए स्‍वाहा ऊपर की ओर से हमेशा रक्षा करें।

          ॐ हृीं पुस्‍तकवासिन्‍यै स्‍वाहा सदाऽधोमा सदावतु,
          ॐ ग्रन्‍थ बीज स्‍वरूपायै स्‍वाहा मां सर्वतोऽवतु।। 13 ।।

ॐ ह्त्रीं पुस्‍तकवासिनी के लिए स्‍वाहा नीचे से मुझे हमेशा रक्षा करें। ॐ ग्रंथ (धर्मशास्‍त्र) के बीज स्‍वरूपा के लिए स्‍वाहा मुझे चारो ओर से रक्षा करें।

          अति ते कथितं शिष्‍य्ं ब्रह्म मन्‍त्रौध विग्रहम,
          इदं विश्‍व जयं नाम कवचं ब्रह्मरूपकम्।। 14 ।।

हे शिष्‍य! सम्‍पूर्ण पाप नाश करने वाला यह ब्रह्ममन्‍त्र तुमको बताया। यह विश्‍व विजय नामक ब्रह्म का रूप है।

।। इति श्री सरस्‍वती कवचम्।।

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