Kaali Kavach
दिव्य श्री काली कवचम्
विनियोग मन्त्र
ॐअस्त्र श्रीकाली कवचस्य भैरव ऋषिर्गायत्री छंद:,
श्री काली देवता सद्य: शत्रु हननार्थे पाठे विनियोग:।
मैं काली कवच का पाठ अपने शत्रु के हनन के लिए कर रहा हूँ। इस कवच के भैरव ऋषि हैं। गायत्री छन्द है एवं इसके देवता स्वयं काली जी हैं।
काली ध्यानम्
ध्यात्वा कालीं महामाया त्रिनेत्रां बहुरूपिणीम्।
चतुर्भुजां लोलजिह्वां पूर्ण चन्द्र निभाननाम्।। 1 ।।
जिनके तीन नेत्र हैं, जिनके अनगिनत रूप हैं, जिनकी चार भुजाएँ हैं, लाल जीभ है तथा जो पूर्ण चंद्र के समान कांतिमान हैं। मैं ऐसा ध्यान करता हूँ।
नीलोत्पलदलश्यामां शत्रुसंघ विदारिणीम्।
नरमुण्डं तथा खडगं कमलं वरदं तथा।। 2 ।।
वो नील कमल से सदृश श्यामावर्णा हैं। शत्रु के समूह का नाश करने वाली हैं। इन्होंने खड़ग, कमल, नरमुण्ड तथा वरदान देने के निमित्त हस्त मुद्रा धारण की हुई है।
विभ्राणां रक्तवसनां घोरदंस्ट्रा स्वरूपिणीम्।
अटट्टाहासनिरतां सर्वदा च दिगम्बराम्।। 3 ।।
लाल वस्त्र धारण किए, भयंकर दाँतों वाली जो कि बड़े जोर से अट्टाहास करती हैं एवं जो सदा नग्न रहती हैं।
शवासनस्थितां देवी मुण्डमाला विभुषिताम्।
इति ध्यात्वा महादेवीं ततस्तु कवचं पठेत्।। 4 ।।
वो शव को आसन बना कर बैठती हैं तथा जो मुण्डों की माला धारण करती हैं। (इस प्रकार से ध्यान करके महादेवी का कवच पढ़ना चाहिए।)
शिव उवाच:
(रावण के द्वारा पूछे जाने पर यह कवच शिवजी ने रावण को बताया था)
ॐकालिका घोर रूपाढ्या सर्वकाम प्रदा शुभा,
सर्वदेव स्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु मे।। 1 ।।
हे घोर रूप को धारण करने वाली, सर्व कामनाओं को देने वाली, सदा शुभ करने वाली एवं समस्त देवों के द्वारा स्तुति किए जाने वाली कालिका देवी मेरे शत्रुओं का नाश करो।
ह्यीं ह्यी स्वरूपिणी चैव ह्यीं ह्यी सं हं गिनी तथा,
ह्यीं ह्यीं क्षैं क्षौं स्वरूपा सा सर्वदा शत्रु नाशिनी।। 2।।
ह्यीं ह्यीं स्वरूप वाली, ह्यीं ह्यीं सं हं बीज रूपा तथा ह्यीं ह्यीं क्षै क्षौं स्वरूप वाली माता सर्वदा ही शत्रुओं का नाश करती रहें।
श्री ह्वीं ऐं रूपिणीं देवी भव बन्ध विमोचिनी,
यथा शुम्भो हतो दैत्यो निशुम्भश्च महासुर:।। 3 ।।
श्री अर्थात् लक्ष्मी, ह्वीं अर्थात् शक्ति, ऐं अर्थात सरस्वती रूपिणी देवी जो भव बन्धनों से स्वतन्त्र कर देती हैं। आपने जिस भाँति से शुम्भ-निशुम्भ का वध किया था।
वैरिनाशाय वन्दे ताँ कालिकाँ शंकर प्रियाम्।
ब्रह्मी शैवी वैष्णवी च वाराही नारसिंहिका।। 4 ।।
गायत्री रूपी, पार्वती रूपी, लक्ष्मी रूपी, वाराही व नरसिंही आदिक अनेक रूप धारण करने वाली शिवजी को प्रिय लगने वाली कालिके! मैं आपको नमस्कार करता हूं। आप मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।
कौमारी श्रीश्चचामुण्डा खाद्ययन्तु मम द्विषान्।
सुरेश्वरी घोररूपा चण्ड मुण्ड विनाशिनी।। 5 ।।
कुमारी लक्ष्मी (कमला), चामुण्डा मुझसे द्वेष करने वालों का भक्षण करो। इन्द्राणी, घोर रूपा चण्ड मुण्ड का विनाश करने वाली।
मुण्डमाला वृतांगी च सर्वत: पातु मां सदा,
ह्त्रीं ह्त्रीं कालिके घोरद्रष्ट्रे रुधिर प्रिये।। 6 ।।
ह्त्रीं ह्त्रीं अर्थात् बारम्बार शक्ति प्रदान करने वाली, विकराल दांतों वाली, रुधिर पान से प्रसन्न होने वाली मुण्डमाला को पहनने वाली कालिके माता सदा सर्वदा मेरी रक्षा करो।
।।इति श्री काली कवचम् समाप्तम्।।
माला मन्त्र
ॐ रुधिर पूर्ण वक्त्रे च रुधिरावितास्तिनी मम शत्रुन खाद्य खाद्य, हिंसय हिंसय, मारय मारय, भिन्धि भिन्धि, छिन्धि छिन्धि, उच्चाटय उच्चाटय, द्रावय द्रावय, शोषय शोषय, यातुधानिके चामुंडे ह्त्रीं ह्त्रीं वाँ वीं कालिकायै सर्व शत्रून समर्पयामि स्वाहा, ॐ जहि जहि, किटि किटि, किरि किरि, कटु कटु, मर्दय मर्दय, मोहय मोहय, हर हर मम् रिपुन् ध्वंसय, भक्षय भक्षय, त्रोटय त्रोटय मातु धानिका चामुण्डायै सर्व जनान, राज पुरुषान, राज श्रियं देहि देहि, नूतनं नूतनं धान्य जक्षय जक्षय क्षाँ क्षीं क्षूँ क्षौं क्ष: स्वाहा।
फल श्रुति
इत्येतत् कवचं दिव्यं कथितं तव रावण:,
ये पठन्ति सदा भक्तया तेश्षां नश्यन्ति शत्रुव:।। 7 ।।
वैरिण: प्रलयं यान्ति व्याधिताशय भविन्त हि,
धनहीन: पुत्रहीन: शत्रुदस्तय सर्वदा।
सहस्त्र पठनात् सिद्धि: कवचस्य भवेत्तदा,
तत: कार्याणि सिद्धि: कवचस्य भवेत्तदा,
तत: कार्याणि सिद्धयन्ति नान्यथा मम् भाषितम्।। 8 ।।
हे रावण! मैने इस दिव्य कवच को तुम्हारे समक्ष कहा है। जो भी दस कवच का पाठ भक्तिपूर्वक नित्य करेगा, उसके शत्रुओं का नाश होगा। उसके शत्रु रोग से पीडि़त होंगे तथा धन पुत्रादि सुखों से वह हीन हो जायेंगे। इसको एक हजार बार पढ़ने से सिद्धि हो जाती है। सिद्ध हो जाने पर मारण प्रयोग में सफलता मिलती है।